हर चुनावी मौसम में एक नया वादा आता है: करोड़ों नौकरियां, नए स्किलिंग मिशन, "युवा-प्राथमिकता" वाला बजट। जो चीज़ सुर्खियों से आगे शायद ही बचती है, वह है कोई ऐसा आंकड़ा जिसकी जवाबदेही एक साल बाद भी कोई लेने को तैयार हो।
हमने क्या पाया
तीन राज्यों में हमने सार्वजनिक बयानों की तुलना राज्य कौशल-विकास बोर्डों के वास्तविक प्लेसमेंट डेटा से की। घोषित लक्ष्यों और सत्यापित प्लेसमेंट के बीच का अंतर इतना लगातार था कि इसे संयोग नहीं कहा जा सकता।
इसका मतलब यह नहीं कि हर योजना असफल रही। कुछ योजनाओं ने वाकई कुछ ट्रेडों में असर डाला — डेटा एंट्री, रिटेल, लॉजिस्टिक्स। समस्या यह है कि सफलता की कहानियों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है जबकि कमियां प्रेस विज्ञप्तियों से चुपचाप गायब हो जाती हैं।
आगे हम क्या पूछ रहे हैं
हमने दो और राज्य बोर्डों से जानकारी मांगी है और प्लेसमेंट अधिकारियों से सीधे बात कर रहे हैं। अगर आप किसी स्किलिंग प्रोग्राम से जुड़े हैं या उसमें आवेदन किया है, तो हमें बताएं कि प्रक्रिया वास्तव में कैसी रही — घोषणा कैसी थी, यह नहीं।
यह एक जारी जांच है। जैसे ही हमें जवाब मिलेंगे, हम इस स्टोरी को अपडेट करेंगे।